
मॉडर्न साइंस के अनुसार इसको आईबीएस नाम से जाना जाता है और आयुर्वेद शास्त्र के अनुसार इसको ग्रहणी संग्रहणी आदि विकार के नाम से संज्ञा दी जाती हैl
आईबीएस पेट से संबंधित रोग है जो छोटी आंत, बड़ी आंत दोनों प्रभावित होती है यह सामान्य तौर पर पेट दर्द, सूजन ,गैस, दस्त, कभी-कभी कब्ज हो जाना लक्षण मिलता है कुछ खानपान आहार लेने के बाद सौच का झूठा प्रेशर होना।
यदि इन लक्षणों को लंबे समय तक नजरअंदाज कर दिया जाए तो भविष्य में इसके कुछ कॉम्प्लिकेशन दिखाई देने लगते हैं हालांकि यह कोई जनरल प्रॉब्लम नहीं होती है शुरुआत में खान-पान में परहेज करके जीवन शैली लाइफस्टाइल में बदलाव करके और तनाव को कम करके इस बीमारी के लक्षणों को कंट्रोल किया जा सकता है।
यह रोग रूटीन क्वालिटी लाइफ को बहुत प्रभावित करती हैं इससे रोगी परेशान होकर शारीरिक और मानसिक विकारों से घिर जाता है और इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को इतना मजबूर कर देता है की ट्रैवलिंग और कार्यशैली पर बुरा प्रभाव पड़ता है कार्य बाधित होते हैं ।
इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम पाचन तंत्र का कमजोर होने से उपरोक्त लक्षणों वाले दिक्कत एवं बीमारी का जन्म होता है
इसके अलावा ज्यादा तनाव के कारण यह बीमारी और भी उग्र होती है सही आहार और हेल्दी लाइफ़स्टाइल अपनाकर इस बीमारी से बच सकते हैं
लेकिन कुछ सलाह या सुझावों अपनाकर आप वास्तव में इसका सफल इलाज कर सकते हैं। आयुर्वेदिक तौर तरीका संग्रहणी आईबीएस को ठीक करने में कारगर है सफल है परहेज के साथ इलाज लाभकारी। क्योंकि सभी पेट के विकार जठराग्नि और भूत अग्नि के परिणाम है आयुर्वेदिक चिकित्सा सिद्धांत मूलभूत रूप से अग्नि का नियमन करते हैं रोग की जड़ पर वार करते हैं।
क्यों होती है ऐसी समस्या
आचार्य चरक जी के अनुसार
त्रयो विकारा प्रयेण ते परस्पर हेतव
अर्शोसि चतिसारश्च ग्रहणी दोष एव च।
अर्थात जठराग्नि के मंद पड़ जाने के कारण डाइजेस्टिव सिस्टम का स्लगिश हो जाने के कारण अर्श (पाइल्स) अतिसार ( डायरिया) ग्रहणी (आईबीएस )संग्रहणी रोग की उत्पत्ति का मेन कारण माना जाता है
इसलिए उपरोक्त विकार से बचने के लिए डाइजेस्टिव फायर जठराग्नि की केयर करनी चाहिए।
अतिसार डायरिया कि निवृत्त होने के बाद तली-भुनी हुई चीजों का गर्म चीजों का परहेज नहीं न करें नहीं तो इससे जठराग्नि कमजोर हो जाती है भोजन पचाने की क्षमता भी कमजोर होती है अग्नि अपने स्थान को दूषित कर देतीहैं ग्रहणी स्मॉल इंटेस्टाइन के फंक्शन का कमजोर कर देती है जिससे ग्रहणी रोग की उत्पत्ति होती है
अग्नि का महत्व क्या है
आयुवर्णों बंल स्वास्थ्यमुत्साहोपचयौ प्रभा। ओजस्तेजोअग्नयह प्राणा श्रोक्ता देहाग्नि हेतुका।।
शांते अग्नि म्रियते, युक्ते चिरं जीवत्यनामय। रोगी स्याद्धिकृते, मूलमग्निस्मानिरुच्यते।।
अर्थात आयु , वर्ण (त्वचा का रंग), बल (शक्ति) ,स्वास्थ्य उत्साह एक्साइटमेंट, शरीर का विकास ,कांति और तेज अग्नि तथा प्राण ये सभी जठराग्नि का सही बने रहने पर निर्भर करती हैं।
यदि आपकी जठराग्नि शांत हो जाती है अर्थात कमजोर हो जाती है तो मनुष्य मर जाता है इसके सही बने रहने पर व्यक्ति लंबे समय तक चिरकाल तक निरोग रह कर जीवित रहता है और इसके विकृत होने पर अर्थात कमजोर पड़ जाने पर, मंद पड़ जाने पर विकारों से रोगों से पीड़ित हो जाता है इसलिए अग्नि को रोगों का मूल कारण माना गया है।
ग्रहणी के प्रकार
वातज ग्रहणी
ग्रहणी रोग से पीड़ित व्यक्ति द्वारा खाया हुआ भोजन सही ढंग से नहीं पचता है आहार का अम्ल पाक हो जाता है अर्थात खट्टी डकार आना आंखों में ड्राइनेस होना गला मुंह सूखने लगता है भुख तथा प्यास अधिक लगती हैं आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है शरीर कमजोर हो जाती है मन उदास रहता है।
पित्तज ग्रहणी
पित्तज ग्रहणी में रोगी का कलर पीला जैसी दिखाई देता है कुछ खाने के बाद मल का वेग आना पित्त दोष के कारण बार बार लूज मोशन लगना, मल दुर्गंधयुक्त होना
एसिडिटी की दिक्कत होना भोजन के प्रति खाने की इच्छा ना होना ।
कफज ग्रहणी
भूख न लगना एक बार खा लेने का दोबारा खाने की इच्छा ना होना इसमें कफ दोष की विकृति होती है पेट में भारीपन खाना काम करने की इच्छा ना होना शरीर हमेशा थका -थका रहना ।
क्या क्या लक्षण है
डाइजेस्टिव पावर कमजोर होना
खाना ना पचने पर भी खाना खाना
अपने प्रकृति के हिसाब से डाइट प्लान न करना
हैवी डाइट लेना
बार-बार खाने की आदत होना
पानी ज्यादा पीना
जठराग्नि का कमजोर होना
क्या क्या लक्षण है
पेट में मरोड़ के साथ मल का त्याग
मल की प्रवृत्ति कई बार होना
ब्रह्मुहूर्त से मध्यान्ह उत्तर काल में की प्रवृत्ति ज्यादा होना
मल त्याग का सेटिस्फेक्शन नहीं होता है
प्रेशर बनने पर मल त्याग नहीं होता है
पेट में भारी भारी होना
पेट में दर्द रहना
वेट लॉस होना
मल दुर्गंधयुक्त व चिकनापन होना
मानसिक कारण भी इसमें अहम रोल निभाता है
चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है
क्या कहता है आयुर्वेद
आयुर्वेद हमेशा सभी बीमारियों का रूट काज का इलाज करता है नब्ज की जांच करा कर अपनी प्रकृति के ही हिसाब से आहार-विहार का सेवन करके प्लस औषधि के सेवन से आईबीएस संग्रहणी पूर्णता ठीक हो जाती है
क्या कहता है आयुर्वेद
आयुर्वेद हमेशा सभी बीमारियों का रूट काज का इलाज करता है नब्ज की जांच करा कर अपनी प्रकृति के ही हिसाब से आहार-विहार का सेवन करके प्लस औषधि के सेवन से आईबीएस संग्रहणी पूर्णता ठीक हो जाती है
समाधान
आयुर्वेदिक चिकित्सा के परामर्श के अनुसार नब्ज जांच करा कर अपनी प्रकृति के अनुकूल आहार का सेवन करें । भार्गव आयुर्वेद संस्थान पेट के रोगो का सफल इलाज जीएमपी सर्टिफाइड कंपनी के प्रोडक्ट के द्वारा करता है। आईबीएस ,संग्रहणी ट्रीटमेंट के लिए दवा जाने और पाएं।
चिकित्सा के अभिलाषी लोग भी नब्ज़ दिखाकर निदान कराके सही एवं सटीक इलाज प्राप्त करें।
जो लोग दूर-दराज में रहते हैं आने में असमर्थ है वह लोग भी संस्थान में संपर्क करके मैसेज डाल कर या वैदिक निदान लिंक के माध्यम द्वारा अपनी समस्या को अपने कंफर्ट पर दर्ज करा कर परामर्श प्राप्त करा सकते हैं
।
उपयोगी प्रोडक्ट्स
Syrup Amozyme खाना खाने के बाद 20 एम एल एक बार दोपहर में ले
Syrup Neo liv 20ml सुबह एक बार खाली पेट लें
Livo detox दो कैप्सूल रात को सोते समय ले
Dizolife SF एक चम्मच रात को सोते समय ले
क्रॉनिक इनडाइजेशन में लाभकारी दवाईयां चारों को एक साथ प्रयोग बहुत कारगर है।



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